महामृत्युंजय मंत्र का रहस्य और प्रयोग

महामृत्युंजय मंत्र का रहस्य और प्रयोग

महामृत्युंजय मंत्र का रहस्य और प्रयोग – ब्रह्माजी की दिव्य वाणी के अनुसार, त्र्यम्बक मंत्र तीन प्रकार के होते हैं – मृत्युंजय, मृतसंजीवनी और महामृत्युंजय।

पहला मंत्र व्याहृतित्रय ‘भूर्भुवः स्वः’ से संपुटित होता है, जिसे ‘मृत्युंजय’ कहते हैं।

दूसरे मंत्र में ‘ॐ, त्रिबीज – हौं जूं सः’ और ‘व्याहृतित्रय’ का संपुट होता है, जिसे ‘मृतसंजीवनी’ कहते हैं।

उपर्युक्त द्वितीय मंत्र में जोड़े गए त्रिबीज और व्याहृतित्रय के प्रत्येक अक्षर के पहले ‘ॐ’ लगाया जाता है। यह तीसरा मंत्र शुक्राचार्य द्वारा प्रतिपादित है।

त्र्यम्बक मंत्रों के स्वरूप

महामृत्युंजय मंत्र का रहस्य और प्रयोग

मृत्युंजय:
ॐ भूः ॐ भुवः ॐ स्वः ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगंधिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बंधनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्। ॐ स्वर्भुवः भूः ॐ सः जूं हौं ॐ॥

महामृत्युंजय मंत्र का रहस्य और प्रयोग

मृतसंजीवनी:
ॐ हौं जूं सः ॐ भूर्भुवः स्वः ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगंधिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बंधनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्। ॐ स्वः ॐ भुवः भूः ॐ सः जूं हौं ॐ॥

महामृत्युंजय मंत्र का रहस्य और प्रयोग

महामृत्युंजय:
ॐ हौं ॐ जूं ॐ सः ॐ भूः ॐ भुवः ॐ स्वः ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगंधिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बंधनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्। ॐ स्वः ॐ भुवः ॐ भूः ॐ सः ॐ जूं ॐ हौं ॐ॥

विशेष: दूसरा मंत्र (मृत संजीवनी) ही प्रचलित महामृत्युंजय मंत्र है।

मंत्र जप क्यों आवश्यक है?

काल की गति को बदलने वाले इस चमत्कारी मंत्र का प्रयोग विशेष रूप से इन परिस्थितियों में किया जाता है:

  • किसी महारोग अर्थात् मृत्युतुल्य रोग की स्थिति में।
  • परिवार में क्लेश और अशांति के निवारण हेतु।
  • किसी नगर या राज्य में महामारी या युद्ध के समय शांति हेतु।
  • धन-हानि, व्यापार में बाधा या राज्य छिन जाने के संकट से रक्षा हेतु।
  • अकालमृत्यु के भय से मुक्ति हेतु।
  • राजदंड के रूप में मृत्यु का भय हो।
  • यात्रा की सफलता हेतु।
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कब और कितना जप करें?

शास्त्रों में विभिन्न कामनाओं की पूर्ति हेतु अलग-अलग संख्या का विधान है:

  • देश पर किसी शत्रु द्वारा आक्रमण, महामारी के फैलने पर – एक करोड़ जप।
  • रोगमुक्ति एवं दुःस्वप्न निवारण के लिए – सवा लाख जप।
  • यात्रा की सफलता हेतु – एक हजार जप।
  • अपमृत्यु निवारण हेतु – दस-दस हजार जप।
  • पुत्र, राज्य-प्राप्ति, सम्मान और धन के लिए – सवा लाख मंत्र का पुरश्चरण।

विभिन्न रूपों में महामृत्युंजय मंत्र

महामृत्युंजय मंत्र का रहस्य और प्रयोग

एकाक्षरी मृत्युंजय मंत्र

हौं
2 लाख जप आवश्यक।

त्र्यक्षरी मृत्युंजय मंत्र

ॐ जूं सः
3 लाख जप द्वारा सिद्ध।

चतुरक्षरी अमृत मृत्युंजय मंत्र

ॐ हौं जूं सः
4 लाख जप आवश्यक।

अष्टाक्षरी मृत्युंजय मंत्र

ह्रीं ॐ नमः शिवायः ह्रीं
8 लाख जप आवश्यक।

नवाक्षरी मृत्युंजय मंत्र

ॐ जूं सः पालय पालय
25 हजार जप आवश्यक।

दशाक्षरी अमृत मृत्युंजय मंत्र

ॐ जूं सः मां पालय पालय
रोगी के नाम सहित जप किया जा सकता है।

पंचदशाक्षरी मृत्युंजय मंत्र

ॐ जूं सः मां पालय पालय सः जूं ॐ जूं सः
सभी कष्टों का निवारण करने वाला मंत्र।

त्र्यम्बक वैदिक महामृत्युंजय मंत्र

त्र्यम्बकं यजामहे सुगंधिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बंधनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्।।
1 लाख जप और हवन आवश्यक।

विभिन्न प्रयोगों के लिए हवन सामग्री

सामान्य हवन सामग्री: यव (जौ), तिल, चावल, घी, चीनी, पंचमेवा।

महामृत्युंजय मंत्र जप (सवा लाख) के बाद हवन हेतु – दूध, दही, दूर्वा, बिल्वफल, तिल, खीर, पीली सरसों, बड़, पलास, खैर की मधुसिक्त समिधा।

बीमारी से मुक्ति, शत्रु विजय, दीर्घायु, संतान सुख, धन प्राप्ति – सुधाबल्ली (गुरुच) की समिधा।

मनचाही लक्ष्मी प्राप्ति – बिल्वफल।

ब्रह्मत्व सिद्धि – पलाश की समिधा।

धन-संपत्ति प्राप्ति – वट (बड़)।

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सौंदर्य प्राप्ति – खैर।

रोग-नाश – दूर्वा।

तीव्र ज्वर निवारण – अपामार्ग (चिचिड़ा) की लकड़ी से पकाई खीर।

शत्रु-विनाश – सरसों।

कृत्या नाश और अकाल मृत्यु निवारण – दही।

वशीकरण – गाय के दूध और दूबांकुर।

बीमारी से मुक्ति – काश्मरी फूल, दूध और अन्न।

मृत संजीवनी यंत्र निर्माण एवं सिद्धि

शुभ मुहूर्त

शिवरात्रि या अन्य शुभ योगों में चांदी, तांबे अथवा भोजपत्र पर अष्टगंध से यंत्र बनाएं।

सिद्ध मृत्युंजय यंत्र

गुग्गल की धूप और धतूर पुष्प अर्पित कर प्रतिदिन 5 या 11 माला जप करें।

देहरक्षक महामृत्युंजय यंत्र

शिवरात्रि, प्रदोष, सोमवार, रवि-पुष्य योग, गुरु-पुष्य योग या अमृत सिद्धि योग में निर्माण करें।
भोजपत्र पर अंकित यंत्र को एक लाख मंत्र जप द्वारा सिद्ध करें।
चांदी के कवच में भरकर दाहिने हाथ में बांधें या गले में धारण करें।

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प्रो. शिव चन्द्र झा, के.एस.डी.एस.यू., दरभंगा में धर्म शास्त्र के प्रख्यात प्रोफेसर रहे हैं। उनके पास शिक्षण का 40 से अधिक वर्षों का अनुभव है। उन्होंने Sanskrit भाषा पर गहन शोध किया है और प्राचीन पांडुलिपियों को पढ़ने में कुशलता रखते हैं।