नरक निवारण चतुर्दशी

नरक निवारण चतुर्दशी

नरक निवारण चतुर्दशी :- पूजा विधि

बन्दे बोधमयं नित्यं गुरुं शंकर रूपिणणम्।
यमाश्रितोपि वक्रोऽपि चंन्द्रः सर्वत्र वंद्यते।

भवानी शंकरं वन्दे नित्यानन्दं जगतगुरुम्।
कामदं ब्रह्मरूपं च भक्तानाम अभयप्रदम्।।

सावित्री त्वं महामाया वरदे कामरूपिणी।
राधाशक्ति संयुक्ता प्रसीद परमेशवरी।।

सावित्री वल्लभं वन्दे जयदयाल कृपानिधे।
देहि में निर्भर भक्तिं योगी त्वच्चरणाश्रितः।।

माघ कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को नरक निवारण चतुर्दशी कहा जाता है । पुराणो के अनुसार इस दिन प्रदोश (सांय काल) भगवान शिव के पूजन को विशेस महत्व दिया गया है । पुराणों के अनुसार इस तिथि पर शंकर भगवान की पूजा करने से सभी पापो का नाश होता है और मनुष्य को नरक के बंधन से मुक्ति मिलति है ।इसलिए इस व्रत को नरक निवारण चतुर्दशी कहा जाता है ।

वर्ष 2020 मेँ यह व्रत 23 जनवरी दिन वृहस्पति वार हो है ।

सर्वप्रथम इस दिन प्रदोश के समय पवित्र होकर पंचदेव और भगवान विष्णू का पुजन करना चाहिये । उसके बाद माता गौड़ी सहित भगवान भोलेनाथ का पुजन विशेस रूप से करना चाहिए । इस दिन भगवान को विभिन्न प्रकार के नैवैध के साथ बेर अर्पण करने का विधान है

नरक निवारण चतुर्दशी व्रतकथा :

लिंग पुराण के अनुसार व्रत कथा इस प्रकार है । एक व्यक्ति गरीबी के चलते घर से भाग गया. जाते-जाते वह जंगल में पहुंचा और बेल के एक पेड़ पर चढ़ गया. वह व्यक्ति पेड़ पर कई दिनों तक भूखे-प्यासे रहा था. उसके पैर से बेलपत्र टूट कर नीचे शिवलिंग पर गिरता था. इससे पूर्व किसी ने भी उस शिवलिंग पर बेलपत्र नहीं चढ़ाया था. पैर से लग कर शिवलिंग पर बेलपत्र गिरने से भगवान शिव उक्त व्यक्ति को अपना दर्शन दिये और उसे धन-धर्म व मोक्ष का आशीष दिये.

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भगवान शिव ने उक्त व्यक्ति से यह भी कहा कि जो कोई भी माघ चतुर्दशी के दिन व्रत रखेगा, उसे नरक से मुक्ति मिल जायेगी. कहा जाता है कि उक्त व्यक्ति को भगवान शिव ने जिस दिन दर्शन दिया था, उस दिन माघ चतुर्दशी थी.

इति श्री नरक निवारण चतुर्दशी व्रतकथा संंपन्न ॥

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प्रो. शिव चन्द्र झा, के.एस.डी.एस.यू., दरभंगा में धर्म शास्त्र के प्रख्यात प्रोफेसर रहे हैं। उनके पास शिक्षण का 40 से अधिक वर्षों का अनुभव है। उन्होंने Sanskrit भाषा पर गहन शोध किया है और प्राचीन पांडुलिपियों को पढ़ने में कुशलता रखते हैं।